Monday, June 17, 2013
























मैं खुद चाहूँ कविता मुझको थामे और स्वीकार करे
जिस के बारे मे लिखता हूँ और शब्द शब्द मुझे प्यार करे

ये अधूरी रह गई तो चेतना सो जायेगी
आसन्न प्रसवा नारी की प्रसव वेदना हो जायेगी

हो कर कविता पूरी मेरी इस पीडा का उपचार करे 
जिस के बारे मे लिखता हूँ और शब्द शब्द मुझे प्यार करे

अधखुले केश,अधखुले नयन,अधखुले अधर मदमाते हैं
मेरी कविता मे आँसू और बिखरे सपने मुस्काते हैं

स्याही सिन्दूर बने इसका और कलम इसका श्रंगार करे 
जिसके बारे में लिखता हूँ और शब्द शब्द मुझे प्यार करे

कविता मे रूप तुम्हारा है,प्रति शब्द स्वयं मे तारा है
जो धूप खिले पल्को के तले उसमे सौन्दर्य तुम्हारा है

जब सुने इसे अन्तरमन से,तारीफ इसकी संसार करे
जिसके बारे मे लिखता हूँ और शब्द शब्द मुझे प्यार करे

तेरी आँखो पर,तेरे गालों पर,तेरे होठो पर,तेरे बालों पर
और अब लिखता हूँ जीवन के भूले बिसरे कुछ सालों पर

चाहत से सजे उन सालो मे क्या पूरा जीवन जी पाया
मै आज सोचता हूँ मैने तब क्या खोया था क्या पाया

मन भावो को लयबद्ध करूँ,प्रति पंक्ति व्यक्त विचार करे
जिस के बारे मे लिखता हूँ और शब्द शब्द मुझे प्यार करे .......

No comments:

Post a Comment