एक रेल की पटरी पर , मैने भटकता बचपन देखा
मन में करुण कराह उठी,था उसे भटकता जिस क्षण देखा
कन्धे पर एक दूषित सा गन्दा बोरा लटकाये
चेहरे पर अपने जीवन की बेबसता का बोझ उठाये
चला जा रहा था लेकिन उस ओर जहाँ सब जाते है
मन्जिल मिलने से पहले, विश्राम पथिक कब पाते हैं
पैरों की दयनीय स्थिति कहती थी आराम करो
किन्तु पेट की अगन उसे धिक्कार रही थी काम करो
एक अजब से असमंजस में घिरा हुआ जीवन देखा
मन में करुण कराह उठी था उसे भटकता जिस क्षण देखा
कचरा ,थैली ,दौने , बोतल बस ये ही खेल खिलौने थे
धूप से झुलसी देह से बहते बूँदो में स्वप्न सलौने थे
आती जाती रेलों के बीच , वो प्रश्नचिन्ह खडा पाया
भारत की हर एक समस्या से,वो बचपन बहुत बडा पाया
भारत के सुखद भविष्यों पर ,जब भी कोई गीत बनाता है
जब देश के ठेकेदारों को , कोई हर पँक्ति में सजाता है
तब दिल से उठती आह,रुदन में ऐसा बचपन होता है
जो घर की जिम्मेदारी में अपना यौवन खो देता है
उस वक़्त हमारे भारत का सारा विकास रुक जाता है
जब कोई बच्चा फेंकी हुई जूँठन को उठा कर खाता है
क्या कारण है इस बच्चे तक कोई स्कूल नहीं पहुँचा ?
दो जून का भोजन भी सोचो तुम क्यूँ अनुकूल नहीं पहुँचा ?
क्या कारण तन को ढकने के संसाधन इसको नहीं मिले ?
जो पुष्प खुसी देते मन को क्यूँ इस धरती पर नहीं खिले ?
सर्दी से ठिठुरती रातों मे ,जब घुटने पेट को ढकते हैं
बारिश से टपकती झुग्गी मे,जब भीगे स्वप्न सुलगते हैं
जब घर मे आई रोटी पर छीना झपटी सी होती है
जब बच्चों को बिलखता देख,भूँख से बेबस ममता रोती है
उस वक़्त बालश्रम भारत की पहली मजबूरी लगता है
पटरी पे भटकता ये बचपन , तब बहुत जरूरी लगता है
पटरी पे भटकता ये बचपन ,तब बहुत जरूरी लगता है
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