Monday, June 17, 2013

देखी  मेरी जो नब्ज़ तो इक लम्हा सोच कर ........
कागज़ लिया और इश्क का बीमार लिख दिया .......



मत पूंछो की किस तरह चल रही है जिन्दगी
उस दौर से गुजर रहे हैं जो गुजरता ही नहीं ..........



इतना भी न याद आया करो की हम सो भी न सके
सुबह को सुर्ख आँखों का सबब पूंछते हैं  लोग ..........




हमारे बाद नहीं आएगा उन्हें चाहत का मज़ा
वो लोगों से कहते फिरेंगे .......मुझे चाहो उसकी तरह ........



वो कौन हैं जिन्हें तौबा से मिल  गयी फुर्सत .......
हमें गुनाह भी करने को जिन्दगी कम है .................



एक महफ़िल मैं कई महफ़िलें होती हैं शरीक
जिसको भी पास से देखॊगे वही तनहा होगा .........



अपने हालात का खुद अहसास नहीं है मुझको
मैंने औरों से सुना है की परेशान हूँ आज कल ......



रोज रोते हुए कहती है जिन्दगी मुझ से ......
सिर्फ इक शख्स की खातिर मुझे बर्बाद न कर ......


दिल धड़कने का तसब्बुर ख्याली हो गया ..........
इक तेरे जाने से सहारा शहर खाली हो गया ......

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