मेरी आँखों में जो काजल की तरह रहता था
आज मुझ को वो ही इक शख्स रुलाता क्यों है..
ओ मुझे भूलने वाले ये बता दे मुझको
अब भी अक्सर मुझे याद तू आता क्यों है..
मेरी तरसी हुई आँखों के ये सूखे आँसू
वक्त बे-वक्त तेरे नाम पे रो जाते हैं
जब भी सीने में सिसक उठते हैं गुजरे लम्हें
मेरे सब ख्वाब तेरी याद में खो जाते हैं
तू मेरा कुछ भी नहीं है तो फिर
तेरी चाहत को मेरा प्यार बुलाता क्यों है..
ओ मुझे भूलने वाले ये बता दे मुझको
अब भी अक्सर मुझे याद तू आता क्यों है..
मेरे हाथों में तेरे नाम की मेंहदी न लगी
लाल जोड़ा भी तेरे नाम का न मेरा था
सातों फेरे मेरे तन्हा थे तेरे ही ग़म में
कितना रोता हुआ मायूस हर एक फेरा था
चाहा कह दूँ मैं ज़माने से कि तुम्हारी हूँ
गैर के घर मेरी डोली लिये जाता क्यों है...
ओ मुझे भूलने वाले ये बता दे मुझको
अब भी अक्सर मुझे याद तू आता क्यों है..
माँग मेरी तेरे सिन्दूर को सिसकती रही
हाथ मेरा तेरी छुअन के लिये
मेरी आँखें तेरी राह तका करती हैं
नींद मेरी तेरे नयन के लिये
फिर वो ही आगोश मुझे दे दे कहीं से आकर
मेरे अहसास से दामन को बचाता क्यों है
ओ मुझे भूलने वाले ये बता दे मुझको
अब भी अक्सर मुझे याद तू आता क्यों है..
बेवफ़ा तू भी नहीं, बेवफ़ा हम भी नहीं
तेरे जाने की खुशी भी नहीं, ग़म भी नहीं
तू नहीं सिर्फ तेरा प्यार मुझे याद है अब
याद वो रात, वो हर बात, वो सावन भी नहीं
दिल मेरा तेरी तमन्ना को छुपाता क्यों है
ओ मुझे भूलने वाले ये बता दे मुझको
अब भी अक्सर मुझे याद तू आता क्यों है..
मेरा माथा तेरी बिन्दी के लिये बेचैन रहा
उसकी तड़पन को जमाने से छुपाया मैंने
वो तेरा प्यार, तेरी कसमें, तेरे वादों का बदन
अजनबी सेज पर हँस हँस के बिछाया मैंने
तेरा हर ख्वाब मेरी आँखों ने जलाया लेकिन
दिल का हर ज़ख्म तेरा शुक्र जताता क्यों है...
ओ मुझे भूलने वाले ये बता दे मुझको
अब भी अक्सर मुझे याद तू आता क्यों है..
उम्र भर तुझसे मुझे इतना ग़िला रखना है
तू अगर चाहता पाना, मुझे पा सकता था
अपने सीने में थोड़ी सी जगह दे के मुझे
वक्त के बेरहम हाथों से बचा सकता था
भूल जाता अगर दुनिया की रिवाज़-ओ-रस्में
तो तेरा नाम मेरी रुसवाई छुपा सकता था
पर तेरे ग़म का असर मुझ पे नहीं है तो फिर
मेरा बेटा मुझे तुझ सा नजर आता क्यों है
ओ मुझे भूलने वाले ये बता दे मुझको
अब भी अक्सर मुझे याद तू आता क्यों है..
अब भी अक्सर मुझे याद तू आता क्यों है..
एक रेल की पटरी पर , मैने भटकता बचपन देखामन में करुण कराह उठी,था उसे भटकता जिस क्षण देखाकन्धे पर एक दूषित सा गन्दा बोरा लटकायेचेहरे पर अपने जीवन की बेबसता का बोझ उठाये चला जा रहा था लेकिन उस ओर जहाँ सब जाते है मन्जिल मिलने से पहले, विश्राम पथिक कब पाते हैंपैरों की दयनीय स्थिति कहती थी आराम करोकिन्तु पेट की अगन उसे धिक्कार रही थी काम करोएक अजब से असमंजस में घिरा हुआ जीवन देखा मन में करुण कराह उठी था उसे भटकता जिस क्षण देखाकचरा ,थैली ,दौने , बोतल बस ये ही खेल खिलौने थे धूप से झुलसी देह से बहते बूँदो में स्वप्न सलौने थेआती जाती रेलों के बीच , वो प्रश्नचिन्ह खडा पायाभारत की हर एक समस्या से,वो बचपन बहुत बडा पायाभारत के सुखद भविष्यों पर ,जब भी कोई गीत बनाता है जब देश के ठेकेदारों को , कोई हर पँक्ति में सजाता हैतब दिल से उठती आह,रुदन में ऐसा बचपन होता हैजो घर की जिम्मेदारी में अपना यौवन खो देता हैउस वक़्त हमारे भारत का सारा विकास रुक जाता है जब कोई बच्चा फेंकी हुई जूँठन को उठा कर खाता हैक्या कारण है इस बच्चे तक कोई स्कूल नहीं पहुँचा ?दो जून का भोजन भी सोचो तुम क्यूँ अनुकूल नहीं पहुँचा ?क्या कारण तन को ढकने के संसाधन इसको नहीं मिले ?जो पुष्प खुसी देते मन को क्यूँ इस धरती पर नहीं खिले ?सर्दी से ठिठुरती रातों मे ,जब घुटने पेट को ढकते हैंबारिश से टपकती झुग्गी मे,जब भीगे स्वप्न सुलगते हैंजब घर मे आई रोटी पर छीना झपटी सी होती हैजब बच्चों को बिलखता देख,भूँख से बेबस ममता रोती हैउस वक़्त बालश्रम भारत की पहली मजबूरी लगता हैपटरी पे भटकता ये बचपन , तब बहुत जरूरी लगता हैपटरी पे भटकता ये बचपन ,तब बहुत जरूरी लगता है
कुछ भीतर मेरे टूट रहा हैये प्रेम रेत सा छूट रहा हैकारण क्या दूँ इस करुणा काक्यूँ "मन" यूँ मन से रूठ रहा हैअब कलम हो चुकी शिथिल मेरीऔर वाणी रिक्त विचारों सेविधवा सी हर रचना है मेरीहै दूर ये अब श्रंगारों सेये करुण कथा करुणान्त हुईअब कैसे इसे सुनाऊँगाजो मेरी व्यथा का विवरण देंवे शब्द कहाँ से लाऊँगातुमको पाने के सब प्रयास अब बचकाने से लगते हैंजो भाव भक्ति थे श्रद्धा थेवे ठग समान अब ठगते हैंजो स्वप्न दिखाये तुमने वोपल्कों पर अब तक जलते हैंहे"प्यार" मेरे दुर्भाग्य तेराधरती अम्बर कब मिलते हैंपर फिर भी मिलन की आस में मैंहर बार क्षितिज तक आऊँगाजो मेरी व्यथा का विवरण देंवे शब्द कहाँ से लाऊँगाआभास, विरह की बलिवेदी पर निज शीश स्वयं दे आये हैंमधुमास अभिलाषी उपवन ने किस्मत से पतझड़ पाये हैंसंकोच हो रहा है मन को सच को दर्पण दिखलाने मेंगीत भाव को बाजारों में आज बेचकर आये हैंमैं व्यथित हृदय की आह मात्रकिस सुर में तुम्हें सजाऊँगाजो मेरी व्यथा का विवरण दें वे शब्द कहाँ से लाऊँगातुम लौकिक सा संसार प्रियेमैं निज अन्तर का अंधकारतुम हो कुबेर का धन अथाहमैं एक भिक्षु की भिक्षा सारतुम नभ की ऊँचाई को भीकरती आलिंगनबद्ध सखेमैं एक स्वाति की बूँद मात्रखोज रहा निज का आधार इसलिये प्रयत्न ही छोड दियेक्यूँकि न तुम्हें पा पाऊँगाजो मेरी व्यथा का विवरण देंवे शब्द कहाँ से लाऊँगाजो मेरी व्यथा का विवरण देंवे शब्द कहाँ से लाऊँगा
आज मुझे आलिंगन देकर मुक्त करो हर भार से...
प्रियतम मेरा हाथ पकड़ कर ले चल इस मझधार से...
नयन मौन हैं किन्तु प्रणय की प्यास संजोये बैठे हैं..
भाव हृदय के स्मृतियों में अब तक खोये बैठे हैं...
तुमसे तृष्णा पाई है तृप्ति तुमसे अभिलाषित है..
विगत दिवस आकुल श्वासों में..खुद को बोये बैठे हैं..
निरीह हूँ लेकिन तुमसे तुमको माँग रहा अधिकार से..
प्रियतम मेरा हाथ पकड़ कर ले चल इस मझधार से..
मेरे स्वप्न तुम्हारी हठ की हठता पर नतमस्तक हैं...
कुछ प्रश्न प्रतीक्षक बने खड़े जिनके उत्तर आवश्यक हैं..
"मन" सोच रहा निज जीवन का सारांश तुम्हें ही कह डालूँ..
ये सत्य है जग को मालूम है, पर उत्तम कहो कहाँ तक है..
मेरे संशय को दो विराम , तुम अर्थपूर्ण उद्गार से..
प्रियतम मेरा हाथ पकड़ कर ले चल इस मझधार से..
आयाम छुये थे कभी प्रेम ने निच्छलता ,सम्मान के..
भेंट चढ गये सभी हौसले , झूठे निष्ठुर अभिमान के.
अब कौन दलीलों से व्याकुल उर की इच्छायें बहलाऊँ..
मेरी आस का दीपक लड़ते-लड़ते बस हार गया तूफान से..
ये अन्तिम जीवन सन्ध्या थी..अब चलता हूँ तेरे द्वार से..
काश तू मेरा हाथ पकड़ मुझे ले जाता मझधार से..
मुझे ले जाता मझधार से.....
गुजरी सारी रात प्यार में..
मदमाती निश्चल काया नेजब अपना सिर रखा हृदय परअधिक गर्व हो आया मुझकोउस व्याकुलता पूर्ण समय परकौन जीव जीवित रख पाताखुद को ऐसे प्रेम प्रणय मेंलौकिक सुख था, छलक उठातभी अचानक अश्रुधार मेंगुजरी सारी रात प्यार में....पल-पल मेरी सजग चेतनाहृदय खींचता ही जाता थाअब न तनिक भी देर रुकोयूँ मौन चीखता ही जाता थापल-पल बढ़ती व्याकुलता औरसमय बीतता ही जाता थाकदम बढ़ा कर जाने कैसेरुक-रुक जाता बार-बार मैं..गुजरी सारी रात प्यार में..मेरा मुझसे निबल नियंत्रणआज हटा ही जाता थारक्त दौड़ता द्रुतगति से औरहृदय फटा ही जाता थाविस्मय था कि उग्र चेतनालुप सी होने वाली थीदो भागों में स्वयं कदाचितआज बँटा ही जाता था"मन" को पागल हो जाना थाउर मे फैले हाहाकार मेंगुजरी सारी रात प्यार में...तभी फैलने लगी सूर्य कीकिरणें मेरे आँगन मेंऔर चन्द्रमा अभी तलकथा सोया मेरे आलिंगन मेंऐसे क्षण तो कभी-कभीही आते हैं इस जीवन मेंप्रेम साथ हो और कटेरैना सारी खुले नयन मेंहार-जीत की बातें करने से अब कोई लाभ नहींकभी-कभी छुप ही जाती हैजीवन भर की जीत हार मेंगुजरी सारी रात प्यार में....गुजरी सारी रात प्यार में....
मैं खुद चाहूँ कविता मुझको थामे और स्वीकार करेजिस के बारे मे लिखता हूँ और शब्द शब्द मुझे प्यार करे
ये अधूरी रह गई तो चेतना सो जायेगीआसन्न प्रसवा नारी की प्रसव वेदना हो जायेगी
हो कर कविता पूरी मेरी इस पीडा का उपचार करे जिस के बारे मे लिखता हूँ और शब्द शब्द मुझे प्यार करे
अधखुले केश,अधखुले नयन,अधखुले अधर मदमाते हैंमेरी कविता मे आँसू और बिखरे सपने मुस्काते हैं
स्याही सिन्दूर बने इसका और कलम इसका श्रंगार करे जिसके बारे में लिखता हूँ और शब्द शब्द मुझे प्यार करे
कविता मे रूप तुम्हारा है,प्रति शब्द स्वयं मे तारा हैजो धूप खिले पल्को के तले उसमे सौन्दर्य तुम्हारा है
जब सुने इसे अन्तरमन से,तारीफ इसकी संसार करेजिसके बारे मे लिखता हूँ और शब्द शब्द मुझे प्यार करे
तेरी आँखो पर,तेरे गालों पर,तेरे होठो पर,तेरे बालों परऔर अब लिखता हूँ जीवन के भूले बिसरे कुछ सालों पर
चाहत से सजे उन सालो मे क्या पूरा जीवन जी पायामै आज सोचता हूँ मैने तब क्या खोया था क्या पाया
मन भावो को लयबद्ध करूँ,प्रति पंक्ति व्यक्त विचार करेजिस के बारे मे लिखता हूँ और शब्द शब्द मुझे प्यार करे .......
सूख गए हैं सब सपने इन पलकों तक आते आतेमाना उनको जाना ही था ,लेकिन मुझ से कह कर जाते गुजरी रात अमावस की जब पूनम आने वाली थीमुख की आभा जब मेरे तन मन पर छाने वाली थीकुछ देर अगर रुक जाते तो सारांश नेह का पा जातेमाना उनको जाना ही था लेकिन मुझ से कह कर जातेसिन्दूर लगा का लगा रह गया शृंगार किया का किया रह गयामेरे अनुनय और विनय का व्यवहार धरा का धरा रह गयाइक नज़र देख लेते मुझको तो मुझ पर नयन ठहर जातेमाना उनको जाना ही था लेकिन मुझ से कह कर जातेसंबंध निभाए मैंने पर कोई कमी रही होगीजिसे पाया सानिध्य उनका वो प्यासी जमीं रही होगीवो गए छोड़ कर मुझ को पर नयनो में नहीं रही होगीमैं उन से अलग रहूँ कैसे जो मुझ से दूर न रह पातेमाना उनको जाना ही था लेकिन मुझ से कह कर जातेमैं आज सोचती हूँ शायद की मेरा प्यार अधूरा हैमेरी तृष्णा से निर्मित मेरा संसार अधूरा हैतुम ही तो थे दर्पण मेरे तुम ही तो मुझे सजाते थेबिना तुम्हारे अब मेरा षोडस शृंगार अधूरा हैकाश मेरे स्वामी मेरी कुछ भूलों को बिसरा पातेमाना उनको जाना ही था लेकिन मुझ से कह कर जातेप्रत्येक प्रहर इस रैना का इस विरह गीत को गायेगाहर पल मधुयामिनी की बैरन स्मृतियाँ सज़ा कर लाएगाकैसे मैं खुद को बहलाऊँ कैसे मैं मन को समझाऊँयदि कक्ष चूड़ियों के टूटन की कथा कभी दोहराएगाप्रस्थान भाग्य था पर फिर भी अधरों से अधर छू कर जातेमाना उनको जाना ही था लेकिन मुझ से कह कर जातेउस प्रथम मिलन की मधुस्मृति मुझ को कैसे सोने देगीऔर तुम्हारे हाथों की वो छुअन नहीं रोने देगीबिस्तर की हर सिलवट से है महक तुम्हारी ही आतीतुम और किसी के हो जाओ ये मुझे नहीं होने देगीमन की इतनी सी थी इच्छा तुम बस मेरे हो कर जातेमाना उनको जाना ही था लेकिन मुझ से कह कर जातेहर रात नेह के साथ मुझे स्पर्श तुम्हारा मिलता थाऔर प्रेम से परिपूर्ण संसर्ग तुम्हारा मिलता थानई भोर के साथ सदा उत्कर्ष हमारा खिलता थाएक ठिठोली खिलती थी और हर्ष हमारा खिलता थाइक बार मुझे चलते चलते आलिंगनबद्ध ही कर जातेमाना उनको जाना ही था लेकिन मुझसे कह कर जातेइस विरह वेदना का कैसे आघात सहूंगी इस मन पेजाते जाते वो छोड़ गए वृद्धावस्था इस यौवन पेनिर्जीव देह रह गई मात्र थे प्राण वे ही तो इस तन केजाना ही था "गर" उनको तो श्वासों का ऋण दे कर जातेमाना उनको जाना ही था लेकिन मुझ से कह कर जातेलेकिन मुझ से कह कर जाते......बस मुझ से कह कर जाते......