Saturday, May 6, 2017

मुहब्बत ही नहीं काफी कड़ा तेवर जरूरी है
चुभे जो आंख को सबकी वो अब मंजर  जरूरी है ।।

उड़ाने ऊँची हों तो होंसला औ सब्र भी रखना
समन्दर की फतह को साथ में लंगर जरूरी है ।।

जमाना नर्म हर लहजे को कायरता समझता है
कहां तक हाथ जोड़ें हाथ अब खंजर जरूरी है ।।

सुना है की दीवारों के भी शायद कान होते हैं
सुनें खामोशियां जो वो दीवार औ दर जरूरी है ।।

तुम्हारे गम को पाला है फफोले हो गये दिल में
तुम्हीं आ जाओ जख्म ऐ दिल को चारागर जरूरी है ।।

                                          विपिन चौहान"मन"

Friday, May 5, 2017

वाक़िफ़ कहाँ ज़माना हमारी उड़ान से
वो और थे जो हार गए आसमान से